साझेदारी की छांव, जाति की दिवाले , नेवता, जजमानी और भारतीय गांवों की जटिल कहानी

सदियों पहले जंगल और गुफाओं से निकल कर मनुष्य जब छोटे-छोटे समूहों में इकट्ठा होकर रहने लगा, तब परिवार बने, फिर समुदाय और समाज बने। जिससे उसकी जरूरतें भी बढ़ने लगीं।

अपने रहन-सहन और खान-पान के लिए उसे खेती करनी थी, घर बनाने थे, औजार चाहिए थे, बच्चों का पालन-पोषण करना था, बीमारियों और संकटों का सामना करना था। कोई भी व्यक्ति या परिवार अकेले यह सब नहीं कर सकता था। इसलिए मेहनत और जिम्मेदारियों की साझेदारी से समाज की अनेक व्यवस्थाएं विकसित हुईं। भारतीय गांव भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपज थे। यहां लोग एक-दूसरे पर निर्भर रहते थे।

खेत वाले को लोहार, बढ़ई, नाई और कुम्हार की जरूरत थी, तो कारीगरों को किसान के अनाज और सहारे की। एक तरह से यह श्रम और जरूरतों की साझेदारी पर आधारित व्यवस्था थी, जिसकी झलक हमें जजमानी, नेवता और सामुदायिक सहयोग जैसी परंपराओं में दिखाई देती है।

यही वह ग्रामीण पक्ष है जिसे सामूहिकता और साझेदारी की दृष्टि से देखा जा सकता है।लेकिन इतिहास की विडंबना यह रही कि इसी साझेदारी के भीतर शक्ति और संसाधनों पर कब्जा रखने वाले समूहों ने ऐसी सामाजिक संरचनाएं भी विकसित कीं, जिन्होंने बराबरी की संभावना को कुचल दिया। श्रम के बंटवारे को जन्म और जाति से जोड़ दिया गया। कुछ समुदायों को सम्मान और अधिकार मिले, तो कुछ को अपमान, बहिष्कार और अधीनता। धीरे-धीरे यह व्यवस्था इतनी कठोर हो गई कि सदियों तक करोड़ों लोगों के जीवन पर इसका बोझ बना रहा।

यही कारण है कि महात्मा गांधी जी और डॉ. भीमराव अंबेडकर जी दोनों गांवों को महत्वपूर्ण मानते हुए भी उन्हें अलग-अलग नजरों से देखते थे।

गांधी जी गांवों में आत्मनिर्भरता, सामुदायिक जीवन और सहयोग की संभावना देखते थे, जबकि अंबेडकर जी गांवों के भीतर मौजूद जातिगत उत्पीड़न, असमानता और सामाजिक बहिष्कार को सामने लाते थे।

अभी मैंने economic political weekly का एक लेख पढ़ा है। लेख के नजरिए से कहें तो भारतीय गांवों की वास्तविकता इन दोनों दृष्टियों के बीच कहीं मौजूद थी। पुराने गांव न तो केवल भाईचारे के स्वर्ग थे और न ही केवल शोषण के अड्डे। वे सहयोग और निर्भरता, सहारे और नियंत्रण, साझेदारी और असमानता- इन सभी विरोधाभासों से मिलकर बने समाज थे।

पुराने भारतीय गांवों में एक ऐसी व्यवस्था भी थी जो लोगों को बांधकर रखती थी, मगर मुश्किल समय में सहारा भी देती थी। यह दुनिया जजमानी, नेवता, खेत और बिरादरी के रिश्तों से बनी हुई थी तो जरूरतों को पुरा करने हेतु क़र्ज़ भी इसका आधार था ।

गांव में बड़े खेत वाले, छोटे किसान, बटाईदार, खेतिहर मजदूर, कारीगर, दुकानदार और साहूकार- सभी किसी न किसी रूप में एक-दूसरे से जुड़े रहते थे। यह जुड़ाव बराबरी का नहीं था, लेकिन पूरे ग्रामीण समाज को चलाने वाला था।

जजमानी: गांव की पुरानी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थागांव में नाई, धोबी, बढ़ई, लोहार, कुम्हार और अन्य सेवा कार्य करने वाले परिवार होते थे। इनके अपने-अपने “जजमान” होते थे, जो प्रायः खेती करने वाले परिवार होते थे।नाई केवल बाल नहीं काटता था। वह शादी का निमंत्रण पहुंचाता, विवाह की तैयारियों में मदद करता और कई सामाजिक कामों में शामिल होता था।

धोबी कपड़ों की व्यवस्था देखता था। बढ़ई और लोहार खेती और घर-गृहस्थी के औजार बनाते थे।इसके बदले उन्हें रोज़ की मजदूरी नहीं मिलती थी। फसल के समय अनाज, कुछ नकद या पारंपरिक हिस्सा दिया जाता था। इस व्यवस्था को जजमानी कहा जाता था।

यानी गांव का जीवन केवल बाजार से नहीं, बल्कि रिश्तों और परंपरागत दायित्वों से भी चलता था।जब शादी में बैंक नहीं, “नेवता” काम आता था। आज शादी के लिए लोग बैंक से लोन लेते हैं, बचत तोड़ते हैं या रिश्तेदारों से मदद मांगते हैं। लेकिन कुछ दशक पहले गांवों में “नेवता” एक तरह का सामाजिक बैंक था।

जब किसी परिवार में शादी होती थी, तो बिरादरी, रिश्तेदार और परिचित लोग नकद राशि देते थे। यह दान नहीं माना जाता था। देने और लेने वाले दोनों इसका हिसाब रखते थे। फिर जब नेवता देने वाले के घर शादी होती, तो पहले मिली हुई राशि वापस की जाती, अक्सर थोड़ा बढ़ाकर।

इस तरह नेवता केवल शुभकामना नहीं था, बल्कि सामाजिक भरोसे और पारस्परिक ऋण की व्यवस्था भी था।कई गरीब परिवारों के लिए तो शादी का बड़ा हिस्सा इसी नेवते से पूरा हो जाता था।

लेकिन शादी विवाह में खर्च तो पहले करना पड़ता था…यहीं से साहूकार और कर्ज की भूमिका शुरू होती थी।शादी का खर्च नेवता मिलने से पहले करना पड़ता था। ऐसे में गांव का दुकानदार-साहूकार या कोई प्रभावशाली भू-स्वामी पहले से पैसा, राशन और अन्य जरूरी सामान उपलब्ध करा देता था।

शादी पूरी होने के बाद जब नेवते की रकम इकट्ठी होती, तो सबसे पहले उसी कर्ज का हिसाब चुकाया जाता।अगर पूरा कर्ज नहीं उतरता, तो बाकी रकम सामान्य ऋण में बदल जाती और उस पर ब्याज चलता रहता। यानी शादी, नेवता और कर्ज- तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। सहारा भी, दबाव भीइस व्यवस्था का एक चेहरा सहयोग का था।

किसी गरीब परिवार की बेटी की शादी हो, अचानक बीमारी आ जाए या कोई बड़ा खर्च आ जाए, तो गांव का समाज किसी न किसी रूप में मदद के लिए मौजूद रहता था।लेकिन इसका दूसरा चेहरा भी था। छोटे किसान, बटाईदार, खेतिहर मजदूर और जिनके पास अपनी जमीन नहीं थी, वे अक्सर बड़े किसानों, साहूकारों या जजमानों पर निर्भर रहते थे। कई बार यह निर्भरता आर्थिक सहायता के रूप में दिखाई देती थी, तो कई बार सामाजिक दबाव और नियंत्रण के रूप में।

यही वह पक्ष था जिसे अंबेडकर जी जैसे विचारकों ने पहचाना और उसकी आलोचना की।

हरित क्रांति के बाद क्या बदला?

1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक में हरित क्रांति के बाद ग्रामीण भारत तेजी से बदलने लगा। खेती की पैदावार बढ़ी। नकदी बढ़ी। बैंक और सहकारी संस्थाएं गांवों तक पहुंचीं। कुछ छोटे और मझोले किसान भी पहले से मजबूत हुए। दूसरी ओर व्यापार और रोजगार के नए अवसर कस्बों और शहरों में मिलने लगे।

ग्रामीण व्यापारी वर्ग का एक हिस्सा शहरों की ओर बढ़ा। गांव के युवाओं ने भी नौकरी, व्यापार और शिक्षा के लिए बाहर जाना शुरू किया।धीरे-धीरे नेवता, जजमानी और पुराने कर्ज संबंधों का महत्व कम होने लगा। अब लोग केवल नेवता देने के लिए दूर-दराज़ की शादियों में जाना जरूरी नहीं समझते थे। मजदूरी और समय की कीमत बढ़ चुकी थी।

गांव की कहानी एक रंग की नहीं है पुराने गांवों को केवल भाईचारे का स्वर्ग कहना भी गलत होगा और केवल शोषण का अड्डा कहना भी।

वहां असमानता भी थी, जातिगत भेदभाव भी था, आर्थिक निर्भरता भी थी। लेकिन वहीं ऐसे सामाजिक तंत्र भी थे जो किसी संकट में लोगों को अकेला नहीं छोड़ते थे।

नेवता, जजमानी और कर्ज की ये व्यवस्थाएं उसी ग्रामीण भारत की याद दिलाती हैं, जहां रिश्ते सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक भी हुआ करते थे।

शायद इसी वजह से पुराने गांवों को समझने के लिए हमें दोनों बातें साथ-साथ देखनी होंगी—अंबेडकर की आलोचना भी, और उस समाज के भीतर मौजूद सहयोग और सहारे की परंपराएं भी।

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