वीर युवा चन्द्रशेखर आजाद

1 Min Read

ज्ञानवापी मस्जिद की पिछवाड़े वाले मैदान में आयोजित एक शाम वाली सभा में भारी भीड़ थी। यह भीड़ एक छोटे लड़के को सम्मानित करने के लिए एकत्रित हुई थी। इस लड़के ने ब्रिटिश नौकरशाही की अवज्ञा की थी, उसका मजाक उड़ाया था।

लड़का इतना छोटा था की भीड़ में लोगों को दिखाई नहीं दे रहा था। उसे मंच पर खड़ा कर दिया गया। वह मालाओं से इतना लदे हुए थे कि चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। केवल उनकी दो छोटी-छोटी आंखें शेर की तरह जल रही थी।

ये सभी बातें उस समय इस लड़के आजाद के मित्र रहे मन्मथनाथ जी ने अपनी आत्मकथा में की है। यह बालक और कोई नहीं चंद्रशेखर आजाद जी थे।बनारस में यह आयोजन चन्द्रशेखर आजाद जी के 12 बेंत की सजा होने के बाद की है।

आगे बढ़ने से पहले हम यह जानते हैं कि आजाद मूल रूप से कौन थे। उनके जीवन काल में ही उनके बारे में अनेक मिथक बन गया था। वे कभी भी अपने बारे में किसी को नहीं बताते थे की वे कौन हैं और कहां से आयें है। जिससे उनके गांव और उनके माता-पिता के बारे में उस समय दुनिया की सबसे मजबूत शक्ति ब्रिटिश सरकार को भी नहीं पता था कि आखिर में चन्द्रशेखर आजाद कौन है, कहां से है।

प्रताप गोपेन्द्र जी ने अपने पुस्तक में उनके जीवन से जुड़े अनेक पहलुओं को उजागर किया है। जिससे हम उनके कुल-खानदान के बारे में आगे जानते हैं।चन्द्रशेखर आज़ाद के पुरखों के सम्बन्ध में इतना ही स्पष्ट है कि वे मूलतः कानपुर के “भैंति” के रहने वाले थे।

आजाद के पिताजी का ननिहाल बदरका में था, जहां उनका बचपन बीता। इनके दो पुत्र हुए। बदरका में पहले पुत्र सुखदेव का जन्म हुआ। फिर 1899 में वे अलीराजपुर के एक गांव भाबरा आ गए। वहीं चन्द्रशेखर आजाद का जन्म हुआ।

आजाद के पिताजी श्री सीताराम तिवारी कट्टर सनातनी थे और छुआछूत अत्यधिक मानते थे। जबकि बच्चा आजाद शुरू से ही भाबरा के आसपास रहने वाले भील बच्चों के साथ समय बिताते थे। जिससे उनके अंदर छुआछूत जैसी कट्टरता नहीं आ सकी। इनका पढ़ाई में भी मन नहीं लगता। पुरे दिन आस पास रह रहे भीलों के बच्चों के साथ खेला करते। जिससे इनके पिताजी नाराज रहते थे।

आजाद के बचपन का सबसे प्रमाणिक तथ्य श्री मनोहरलाल त्रिवेदी जी के संस्मरण में उभरा है। वे लिखते हैं-” जब सुखदेव( आजाद के बड़े भाई) की उम्र तेरह-चौदह और आजाद की सात-आठ वर्ष थी। तब मैं उन्हें पढ़ाया करता था। आजाद बचपन से ही न्यायप्रिय और उच्च विचारोंवाला था।

एक बार मैं पढ़ा रहा था, तो जान-बूझकर एक शब्द मैंने गलत बोल दिया। इस पर आज़ाद ने वह बेंत, जो मैं उनको पढ़ने में डराने-धमकाने को अपने पास रखे रहता था, उठाया और दो बेंत मुझे मार दिये। यह देख तिवारी जी दौड़े उन्होंने आज़ाद को इसके लिए पीटना चाहा, लेकिन मैंने उन्हें रोक दिया। पूछने पर आज़ाद का उत्तर था, ‘हमारी गलती पर मुझे और भाई को ये मारते हैं तो इनकी गलती पर मैंने इन्हें मार दिया…”

उनके बारे में यह कथा बताई जाती है कि भीलों के द्वारा एक भील अपराधी को दंड दिया जा रहा था। आजाद वहाँ मौजूद थे, उन्हें भी उस पर तीर चलाने का मौका दिया गया। उन्होंने सच्चा निशाना लिया और भील को काना कर दिया। हालाँकि भीलों के रिवाज में यह मान्य था, लेकिन इस कृत्य को उनके माता-पिता बहुत नाराज़ हो गये थे। उसी के बाद उन्हें मनोहर लाल जी के यहां अलीराजपुर पढ़ने भेज दिया गया।

उनके मित्र श्री वैशम्पायन लिखते हैं कि उन्ही दिनों अलीराजपुर में एक मोती बेचने वाला आया था। उससे आजाद की दोस्ती हो गई।

उनके बचपन के अध्यापक इनको अपने आफिस में काम दिला दिया था। वहां से छुटने के बाद वे मोतीहार के डेरे पर जाते उससे बम्बई की बात सुनते।

मनोहर लाल जब छुट्टी गये हुए थे। आजाद मोती हारा के साथ घर छोड़ कर निकल पड़े। कुछ लोगों का मत है की वे एक मोतीहारा के साथ पहले मुम्बई गये। फिर वहां से बनारस संस्कृत की शिक्षा हेतु बनारस आ गये। यहीं से उनके राजनीतिक जीवन का शुरुआत हुआ।

बनारस में वे संस्कृत का अध्ययन कर रहे थे। तभी गांधी जी के असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई थी। बहुतों की तरह गांधी जी से प्रभावित होकर आजाद जी भी स्वतंत्रता के आंदोलन में कम उम्र में शामिल हो गए।सर्वप्रथम वे यहां ‘असहयोग संस्कृत छात्र समिति’ में शामिल होकर राजनीति में सक्रिय हो गयें। तथा असहयोग आंदोलन के नियम के तहत शराब की दुकानों की बंदी, सरकार का असहयोग तथा लोगों को इस जोड़ने के काम में लग गयें। इन्हीं परिस्थितियों में बनारस में इनकी गिरफ्तारियां हुई।

अभी तक जैसे कि यह समझा जाता था कि बनारस में उनकी गिरफ्तारी पहली बार हुई और पहली बार में ही सजा दी गई, ऐसा नहीं था। चंद्रशेखर आजाद जी की इससे पहले गिरफ्तारी सर्वप्रथम दिसंबर1921 में हुई थी। जिसमें नाबालिक बच्चों को छोड़ दिया गया था।

जब पहली बार 1921 में इन लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। उनमें से एक “राम प्रसाद कहार” को मजिस्ट्रेट की अवहेलना पर 20 बेंत की सजा हुई थी। संभवत आजाद जी पर इसी का प्रभाव रहा वे भी जब दुबारा गिरफ्तार हुए मजिस्ट्रेट से अवहेलना पूर्वक बात करते रहे।

जैसे की एक कहानी चर्चित है की जज के पुछने पर अपना नाम “आजाद” पिता का नाम “स्वतंत्रता” और घर का पता “जेल” बताया था। मजिस्ट्रेट ने उसी गुस्से में इन्हें 12 बेंत की सजा का आदेश दिया था। इनके साथ और जितने लोग गिरफ्तार हुए उन्हें उसी दिन रिहा कर दिया गया।

चन्द्रशेखर आज़ाद जी और एक अन्य साथी को शिवपुरी जेल भेज दिया गया। कहा जाता है कि वाराणसी के कलेक्टर ने अपने आवास पर बुलाकर समझाया की वे अभी बच्चे हैं माफी मांग ले इनकी सजा खत्म कर दी जायेगी। आजाद को यह स्वीकार नहीं था। उसके बाद इन्हें 12 बेंत की सजा पुरी की गई।

ऊपर जो सम्मान समारोह का दृश्य है इसी सजा के बाद का है। इसके आलावा इनकी बनारस में तीसरी बार और गिरफ्तारी हुई जिसकी चर्चा शिव विनायक मिश्र जी ने किया है । उनके अनुसार शहर से 20-22 किलोमीटर दूर बड़ागांव जौनपुर रोड पर एक सभा करते हुए उनकी गिरफ्तारी हुई थी जिसमें एक भीड़ को संबोधित कर रहे थे।

वे लोगों से असहयोग आंदोलन में जुड़ने, सत्याग्रह में चंदा देने तथा लोगों अश्पृश्यता को छोड़ने के लिए जागरूक कर रहे थे। तभी वहां अंग्रेज पुलिस आ गयें और उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

यह गिरफ्तारी जून 2022 में हुई थी तब तक असहयोग आंदोलन वापस लिया जा चुका था। चुकी उस समय आज की तरह सुचना तेजी से नहीं पहुंचती थी। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि आन्दोलन वापस लिया जा चुका है उन्हें बहुत दुख व क्रोध आया।

असहयोग आंदोलन ठप हो जाने से विचलित आजाद को शिवप्रसाद गुप्त जी अपने घर ले गए। शिवप्रसाद गुप्त जी के संबंध भगत सिंह के चाचा अर्जुन सिंह जी से भी था। इस तरह से धीरे-धीरे वे क्रांतिकारी की अगुवाई वाले लोगों के सम्पर्क में आने लगे।

चन्द्रशेखर आजाद, गुप्त जी के वहां टिक नहीं सके। असहयोग आंदोलन में भाग लेने के बाद से उनके अंदर स्वतंत्रता की बेचैनी आ गई थी। 1921 में जब आजाद जेल गए हुए थे तभी उन्हीं की तरह एक नाबालिक प्रणवेश उनका मित्र बने। उनका मित्र बंगाल के क्रांतिकारीयों से जुड़ा हुआ था। यहीं से चंद्रशेखर आजाद के संपर्क बंगाल के कुछ क्रांतिकारी दलोंसे होने लगे।

सन 1920 में आजाद जब बनारस आए तो जंगल से निकलें एक सधारण छात्र थे। लेकिन बनारस छोड़ते समय तक वे वीर बालक, आजाद और क्रांतिकारी होकर निकले।

स्रोत सुधीर विद्यार्थी और प्रताप गोपेन्द्र जी की किताब से।

You might also like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *